'भारतीय पेंट्स हैं ख़तरनाक'

भारतीय घरों के दरो-दीवार, खिड़कियों और दरवाज़ों पर रंग बिखेरते पेंट्स अपनी कीमत लोगों की जेब के साथ साथ अक्सर उनकी सेहत से भी वसूल रहे हैं.
विज्ञानं और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था सेटर फार साईंस एंड एनवायरनमेंट ने दावा किया है कि भारत में बिकने वाले ज़्यादातर पेंट में स्वास्थय के लिए हानिकारक सीसे की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है.
सीसा एक विषैला रसायन है जो आम लोगो की सेहत और बच्चों के मानसिक विकास में बाधा पैदा कर सकता है.
सीएसई ने अपनी स्टडी के लिए पांच बड़ी कंपनियों के मशहूर ब्रांडों को चुना, प्रयोगशाला में उनकी जांच करवाई और पाया कि इनमें से ७० प्रतिशत से ज्यादा में सीसे की मात्रा अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय मानकों से बहुत ज्यादा थी.
सीएसई के सह-निदेशक चन्द्र भूषण का कहना है पांच में सिर्फ एक कंपनी के उत्पाद में सीसा नहीं पाया गया. कई ब्रांडों में तो यह भारतीय मानक ब्युरो की तय शुदा सीमा से दो सौ गुना अधिक था.
भारतीय मानक ब्यूरो का यह मानक स्वेच्छिक है.
सीसा जिसका इस्तेमाल घरेलु पेंट्स के अलावा बैटरी, कपडे धोने के साबुन और पौदारों में भी होता है डाक्टरों के मुताबिक महामारी से भी ख़तरनाक है और वो इसे साइलेंट एपीडेमिक या खामोश महामारी भी पुकारते हैं.
डाक्टरों का कहना है कि सीसा सांस के साथ अन्दर जाने के अलावा, छूने, चाटने जैसे माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकता है.
शोध में पाया गया है की सीसा बच्चों के सोचने समझने की क्षमता कम करता है, गर्भवती औरतों पर असर डाल सकता है.
कई बार इसे कैंसर और ब्लड प्रेशर से भी जोड़ कर देखा गया है.
अमरीकी संस्था टॉक्सिक सब्सटांस एंड डीजीज़ रजिस्ट्री के मुताबिक ख़ून के एक डेसी लीटर में दस माईक्रो ग्राम से अधिक सीसे की मौजूदगी घातक हो सकती है.
कुछ प्रयोगों के आधार पर भारत के ६० प्रतिशत से अधिक बच्चों के शरीर में यह इस अनुपात से कई गुना अधिक होगी.
उद्योग का कहना है की हालाँकि भारत में पेंट्स के लिए कोई मानक स्थापित नहीं लेकिन फिर भी उन्होनें स्वैच्छिक तौर पर घरेलू रंग रोग़न में सीसे की मौजूदगी को अगले तीन सालों में नगण्य स्तर पर यानी दशमलव एक प्रतिशत पर ले जाने का लक्ष्य रखा है.
भारतीय पेंट्स संघ के अध्यक्ष्य हर्निश जुथानी कहते हैं कि सीसे की मात्रा कम करने के लिए क्रोम पिगमेंट्स की जगह आर्गेनिक पिगमेंट्स का इस्तेमाल करना होगा जिससे घरेलु पेंट्स काफी महंगा हो जायेगा; वह खर्च बड़ी कम्पनियाँ तो बर्दाश्त कर पाएंगीं लेकिन छोटी कंपनियों को इसमें दिक्कतें आ सकती हैं.
सीएसई ने माना है कि चंद कंपनियों ने जांच के दौरान ही विषैले रसायन की मात्रा अपने उत्पाद में कम कर दी थी.
फिर भी उसने मांग की है कि सरकार इस क्षेत्र में एक मानक स्थापित करे
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